पित्त दोष को आयुर्वेद में शरीर के उस नियंत्रक सिद्धांत के रूप में देखा जाता है जो अग्नि और जल तत्व से मिलकर बना है। यह शरीर में परिवर्तन, रूपांतरण, पाचन, बुद्धि, तेज, रंग और ताप को संचालित करता है। पित्त का कार्य केवल भोजन को पचाने तक सीमित नहीं, बल्कि शरीर-मन के हर स्तर पर गति लाता है। जहां भी कोई परिवर्तन हो रहा है, रूप में, विचारों में, भावनाओं में, ऊर्जा में, वहां पित्त अपना सूक्ष्म कार्य कर रहा होता है। पित्त का मूल स्वभाव गर्म, हल्का, तरल, तीक्ष्ण, तीव्र, फैलने वाला और तेलीय माना गया है। इसलिए जिन लोगों में यह स्वभाव अधिक होता है, उनके व्यक्तित्व में तीक्ष्णता, निर्णय क्षमता और उत्साह अधिक दिखाई देता है। उनकी बुद्धि तेज, विचार स्पष्ट और कार्य करने का उत्साह हमेशा सक्रिय रहता है, परंतु यही ऊर्जा असंतुलन होने पर चिड़चिड़ापन, क्रोध, जलन और असहिष्णुता में बदल जाती है।
पित्त की प्रेरणा अग्नि तत्व से आती है, जो शरीर में जठराग्नि के रूप में भोजन को तोड़ता है और रस, रक्त, मांस आदि धातुओं के निर्माण में भाग लेता है। पित्त की उपधातुएँ जैसे पैच्चक पित्त, भ्राजक पित्त, सादक पित्त, रंजक पित्त और आलोकक पित्त शरीर के विभिन्न हिस्सों में अपना व्यापक प्रभाव डालती हैं। पैच्चक पित्त पाचन क्रिया का मुख्य संचालक है। भ्राजक पित्त त्वचा में स्थित होकर रंग, तेज और ताप को नियंत्रित करता है। सादक पित्त हृदय और मन में रहती हुई स्मरण शक्ति, बुद्धि और भावनाओं को दिशा देती है। रंजक पित्त यकृत और रक्त निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है, जबकि आलोकक पित्त दृष्टि प्रदान करता है। इस प्रकार पित्त का स्वभाव केवल पेट तक सीमित नहीं बल्कि पूरे शरीर पर व्यापक प्रभाव डालता है।
जब पित्त संतुलित अवस्था में रहता है, तो शरीर चमकदार, ऊर्जा से भरा हुआ, पाचन मजबूत और मन स्पष्ट रहता है। निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और जीवन में एकाग्रता बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति साहसी, योजनाबद्ध, साफ-साफ बोलने वाले और कर्मशील होते हैं। उनकी शारीरिक गर्मी सामान्य स्तर पर रहती है और भोजन का पाचन इतना अच्छा होता है कि भूख समय पर लगती है और भोजन सहजता से परिवर्तित होकर शरीर के पोषक तत्त्वों में बदल जाता है। पित्त के गुणों के कारण ऐसे लोग नेतृत्व, प्रबंधन और विश्लेषणात्मक कार्यों में अधिक सफल दिखाई देते हैं।
लेकिन जब यही पित्त बढ़ जाता है, तो शरीर में अधिक गर्मी, एसिडिटी, जलन, मुंह में कड़ुवाहट, बार-बार प्यास लगना, त्वचा पर दाने निकलना, पसीने में बदबू, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और नींद में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। पित्त वृद्धि का संबंध कई आदतों से होता है, बहुत अधिक मसालेदार भोजन, तला हुआ खाना, खट्टे पदार्थ, गरम प्रकृति वाले खाद्य पदार्थ, देर तक जागना, धूप में अधिक रहना, शराब या अत्यधिक चाय-कॉफी जैसी चीजें पित्त को जल्दी बढ़ाती हैं। इसी प्रकार तनाव, प्रतिस्पर्धा और निरंतर तनावपूर्ण काम भी पित्त की तीक्ष्णता को बढ़ाते हैं। यदि पित्त लंबे समय तक असंतुलित रहे, तो गैस्ट्रिक अल्सर, त्वचा रोग, माइग्रेन, अत्यधिक पसीना, हेपेटिक विकार और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।
पित्त का मूल स्वभाव गर्म और तीक्ष्ण होने के कारण इसे शांत करने के लिए शीतल, मधुर, रसयुक्त, तैलीय और स्थिर गुणों वाले आहार-विहार की आवश्यकता होती है। पित्त प्रकार के लोगों के लिए ठंडे पेय, नारियल पानी, सौंफ, मुलेठी, खीरा, तरबूज, कद्दू, घी, दूध और मीठे स्वाद के पदार्थ लाभकारी होते हैं। सूर्य की सीधी गर्मी से बचना, समय पर भोजन करना और नींद को नियमित बनाए रखना आवश्यक है। मन के स्तर पर ध्यान, श्वास-व्यायाम, चंद्र-भेदन प्राणायाम और साफ-सुथरे वातावरण में रहना पित्त को स्थिर और शांत करता है।
पित्त का स्वभाव तीव्र होने के कारण ये लोग भावनाएँ भी जल्दी अनुभव करते हैंकृक्रोध भी तेज, प्रेम भी तेज, निर्णय भी तेज और क्रिया भी तेज। इसलिए पित्त का संतुलन इन व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। जब पित्त संतुलन में होता है, तो व्यक्ति स्पष्ट दृष्टि, सूझबूझ और आत्मविश्वास से भरा होता है। जब असंतुलन आता है, तो वही स्पष्टता भ्रम में और वही आत्मविश्वास अहंकार में बदल जाता है। इसलिए पित्त का मूल स्वभाव शरीर-मन की एक ऐसी ऊर्जा है जो तेज भी है और यदि नियमन न किया जाए तो हानिकारक भी बन सकती है।
आयुर्वेद के अनुसार पित्त को समझना जीवन को समझने जैसा है, क्योंकि हर परिवर्तन पित्त के माध्यम से ही घटित होता है। इस दोष को पहचानकर अपने भोजन, आदतों और जीवनशैली में छोटे-छोटे परिवर्तन करके व्यक्ति सहज रूप से संतुलित, उज्जवल और शांत जीवन जी सकता है। पित्त को नियंत्रित करना स्वयं की गति को नियंत्रित करने जैसा है, जहाँ तीव्रता भी है और संतुलन भी आवश्यक।
Dr. (Vaidhya) Deepak Kumar
Adarsh Ayurvedic Pharmacy
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