लोहड़ी : अग्नि में माया के स्वाहा का पर्व

13 जनवरी को देश के विभिन्न हिस्सों में लोहड़ी का पर्व मनाया जा रहा है। मान्यता है कि यह वर्ष का सबसे ठंडा समय होता है और इसी कारण इस दिन अग्नि जलाई जाती है, ताकि ठंड से रक्षा हो और ईश्वर से ऊष्मा व जीवन-ऊर्जा की प्रार्थना की जा सके। पर लोहड़ी केवल एक मौसमी उत्सव नहीं, बल्कि अपने भीतर गहरे आध्यात्मिक संदेश को समेटे हुए पर्व है।

संसार माया के नियम से चलता है। यदि इन नियमों को ध्यान से देखा जाए, तो लोहड़ी, मकर संक्रांति, पोंगल, दिवाली और दशहरा—सभी त्योहार किसी न किसी रूप में ब्रह्म का संदेश देते हैं। ये सभी पर्व माया के रूप में दिखाई देते हैं, पर इनके भीतर ब्रह्म का सत्य छिपा है। मनुष्य माया में उलझकर दो में जीता है—सुख-दुख, लाभ-हानि, मेरा-तेरा—और अंततः उसी दो में बँधकर जीवन समाप्त कर देता है।

ब्रह्म की बनाई इस सृष्टि में जब मनुष्य माया को अपने भीतर स्थान दे देता है, तो वही माया राक्षस बन जाती है। राक्षस का अर्थ केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि वह व्यक्ति है जो सदा दुखी रहता है। माया तब राक्षस बनती है जब वह बाहर नहीं, भीतर प्रवेश कर जाती है। जब भीतर ब्रह्म की जगह माया बैठ जाती है, तो व्यक्ति राक्षस प्रवृत्ति का हो जाता है और उसका जीवन दुखदायी बन जाता है।

इसलिए यह समझना आवश्यक है कि रावण, कुंभकरण या मेघनाद ही राक्षस नहीं थे। इतिहास बताता है कि राक्षसों से अधिक पूजा शायद ही किसी ने की हो। फिर भी वे राक्षस कहलाए, क्योंकि वे “मैं” और “मेरा” में जी रहे थे। उन्होंने भगवान से भी वरदान के रूप में माया ही माँगी। पूजा-पाठ तभी सार्थक है, जब उससे अहंकार उत्पन्न नहीं हो।

आज आवश्यकता है कि मनुष्य स्वयं से प्रश्न करे। यदि जीवन केवल बाहरी उत्सवों तक सीमित रह गया है—फुल्ले-रेवड़ियाँ खाना, आग जलाना, हाथ सेकना—तो त्योहार का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। हर उत्सव जीवन को समझने का संकेत देता है। लोहड़ी की अग्नि वही है, जो हवन कुंड में प्रज्वलित होती है। उद्देश्य केवल लकड़ियाँ जलाना नहीं, बल्कि ‘दो’ (द्वैत) से पार जाकर ‘एक’ (अद्वैत) को पाना है।

अग्नि में “स्वाहा” करने का अर्थ केवल सामग्री अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर की माया को जलाना है। “मैं-मेरा”, मेरा धन, मेरी वस्तुएँ, मेरा परिवार—और साथ ही काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—ये सभी भीतर के विकार हैं। लोहड़ी की अग्नि हमें प्रेरणा देती है कि हम इन विकारों को स्वाहा करें।

यह प्रक्रिया बाहरी नहीं, भीतरी है। इसके लिए अग्नि जलाना आवश्यक नहीं। मनुष्य जहाँ बैठा है, वहीं आँखें बंद कर अपने भीतर अग्निकुंड प्रज्वलित कर सकता है और अपने विकारों का स्वाहा कर सकता है। बाहर के आडंबर से अधिक ज़रूरी है अंदर की शुद्धि।

यदि बाहर रेवड़ी-मूँगफली का उत्सव हो और भीतर विकार जलें, तो वही सच्चा उत्सव है। जब भीतर की माया जलती है, तब भीतर का प्रकाश प्रकट होता है। तब प्रकृति भी उसकी गवाही देती है। अपने भीतर के चाँद को प्रकट करना ही जीवन को परम-जीवन की ओर ले जाता है।
लोहड़ी का यही संदेश है—कि यह जन्म केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मबोध के लिए है। जब मनुष्य भीतर से मुक्त होता है, तभी यह जीवन और यह उत्सव सार्थक होता है।

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