हरिद्वार। गंगा की नगरी हरिद्वार देश-दुनिया में आस्था, साधना और संत परंपरा की पहचान रखती है। कुंभ, अर्धकुंभ और विभिन्न धार्मिक आयोजनों में देशभर से संत-महात्मा, अखाड़े और श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लेकिन इसी संत नगरी में समय-समय पर सामने आने वाले विवाद, आरोप-प्रत्यारोप, आपसी मतभेद और प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा ने धार्मिक जगत के बदलते स्वरूप को लेकर सवाल खड़े किए हैं। संतों द्वारा संतों पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच यह सवाल भी उठता है कि गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच और धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर खुलकर संवाद क्यों न हो।
ब्रह्मलीन स्वामी राजराजेश्वरानंद सरस्वती महाराज की रचनाओं में संत समाज के बदलते स्वरूप पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। उनकी ये पंक्तियां आज के परिवेश में भी कई सवाल खड़े करती हैं-
एक पल नहीं जिए जो इंसान की तरह।
वह पुज रहे हैं आज भगवान की तरह।।
मेहरबानी मीडिया की रुपयों की वजह से।
दुनिया में छा गए हैं तूफान की तरह।।
उपदेश दे रहे हैं औरों को शांति का।
आपस में लड़ रहे हैं पहलवान की तरह।।
फूलों की तरह खिलते, मिलते नहीं हैं संत।
टीवी के खुलते, खुलते दुकान की तरह।।
राजेश त्याग हरि को धनियों के हाथ में।
साधु भी बिक रहे हैं सामान की तरह।।
कविता की ये पंक्तियां संत जीवन के मूल्यों और वर्तमान दौर में दिखाई देने वाली कुछ प्रवृत्तियों के बीच अंतर पर व्यंग्य करती हैं। खासतौर पर मीडिया, प्रचार, आर्थिक प्रभाव और संतों के बीच मतभेदों को लेकर उठाए गए सवाल आज सोशल मीडिया के दौर में और अधिक चर्चा का विषय बन गए हैं।
मण्डलेश्वर से महामण्डलेश्वर तक बदलता स्वरूप
संत परंपरा में मण्डलेश्वर, महामण्डलेश्वर, जगद्गुरु और शंकराचार्य जैसी उपाधियों की अपनी धार्मिक गरिमा और परंपरा रही है। इनके स्वरूप और प्रचलन को लेकर अलग-अलग अखाड़ों तथा धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं भी मिलती हैं। पूर्व में मण्डली के प्रमुख संत को मण्डलीश्वर कहा जाता था। मण्डली का नेतृत्व करने वाले संत ज्ञान, वेद-शास्त्रों की समझ और शिष्य परंपरा के निर्वहन में निपुण होते थे। बाद के दौर में मण्डलेश्वर और फिर महामण्डलेश्वर शब्द का प्रचलन बढ़ा और आज स्थिति यह है कि लम्मपट भी महामण्डलेश्वर बनते देखे जा सकते हैं।

इसी संदर्भ में श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी से जुड़े आचार्य मण्डलेश्वर स्वामी कृष्णानंद गिरि महाराज का प्रसंग भी सामने आता है। बताया जाता है कि 1960 के दशक में श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के आचार्य मण्डलेश्वर स्वामी कृष्णानंद गिरि महाराज विदेश यात्रा पर गए थे। विदेश से लौटने के बाद संन्यास मार्ग स्थित श्री सूरत गिरि बंगला गिरिशानंद आश्रम में उनके सम्मान में कार्यक्रम हुआ। इसी दौरान सम्मान समारोह में एक संत ने कहाकि की शेष तो मण्डलेश्वर हैं और आप विदेश में सनातन की पताका को फहराकर आए है, इसलिए आप महामण्डलेश्वर हुए। बस फिर क्या था तभी से महामण्डलेश्वर की उत्पत्ति हो गयी और आज जिसे देखो महामण्डलेश्वर बनने की दौड़ में लगा हुआ है। महामण्डलेश्वरों में अधिकांश विद्वता की कसौटी पर खरा नहीं उतरते।
उपाधियों की गरिमा पर बहस
आज सवाल केवल उपाधियों की संख्या का नहीं, बल्कि उनकी गरिमा और चयन प्रक्रिया का भी है। यदि किसी धार्मिक उपाधि का संबंध ज्ञान, साधना, त्याग, शास्त्र-अध्ययन और लोकसेवा से है तो स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा भी होगी कि उसकी प्रतिष्ठा इन्हीं कसौटियों पर कायम रहे।
संत समाज के भीतर से ही समय-समय पर ऐसी आवाजें उठती रही हैं कि धार्मिक उपाधियों को प्रतिष्ठा या प्रभाव का माध्यम बनाने के बजाय उनकी मूल आध्यात्मिक भावना को बनाए रखा जाना चाहिए। वहीं, किसी व्यक्ति या संस्था पर उपाधि के लिए आर्थिक लेन-देन जैसे आरोप लगाए जाएं तो उनका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रमाण और पारदर्शी जांच से होना चाहिए। आज पैसे के दम पर जगद्गुरु और शंकराचार्य भी बनाए जाने की परम्परा शुरू हो गयी है। इतना ही नहीं आज राजनैतिक दलो ंके समर्थक जगद्गुरु और शंकराचार्य देखने को मिलते हैं। स्थिति यह है कि आदी शंकराचार्य द्वारा बनाए गए चार मठों के चार शंकराचार्य के अलावा दर्जनों शंकराचार्य बने घूम रहे हैं। न तो सरकारें और न ही धर्म के ठेकेदार इस संबंध में कुछ बोलने के लिए तैयार हैं। हां इतना जरूर है कि बात-बात पर ये एक-दूसरे की लंगोटी खोलने के लिए तैयार रहते हैं।
मीडिया के दौर में संतों की बदलती छवि
धार्मिक गतिविधियों में मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ी है। संतों के प्रवचन, धार्मिक आयोजन, बयान और सामाजिक गतिविधियां कुछ ही समय में देश-दुनिया तक पहुंच जाती हैं। इससे धार्मिक संदेशों के प्रसार का दायरा निश्चित रूप से बढ़ा है, लेकिन प्रचार और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन को लेकर सवाल भी सामने आए हैं। कुछ तो मीडिया के जरिए अपने आप को भगवान तक साबित करने पर तूले हुए हैं। एक कथित संत हैं जो अपना दसवां जन्म बताते हैं और दावा करते हैं कि दस जन्मों से वह महादेव की सेवा करते चले आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उत्पन्न होता है कि जो व्यक्ति नौ जन्मों तक महादेव की सेवा में लीन रहा हो उसे मोक्ष की प्राप्ति कैसे नहीं हुई। क्यों वह जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा हुआ है।
आलम यह है कि आज के कथित बाबा साधक कम और टीवी व सोशल मीडिया के बाबा बनकर रह गए हैं। संत परंपरा की बुनियाद त्याग, अपरिग्रह, संयम, साधना और लोककल्याण जैसे मूल्यों पर मानी जाती है। ऐसे में धार्मिक क्षेत्र में धन, प्रभाव और प्रतिष्ठा की बढ़ती चर्चाएं मूल सवाल सामने लाती हैं-क्या साधु जीवन की पहचान उसके बाहरी वैभव और सार्वजनिक प्रसिद्धि से होनी चाहिए या उसके ज्ञान, आचरण, साधना और सेवा से? स्थिति यह है कि अपने को कठोर साधक दिखाने के लिए कुछ कथित बाबा हजारों रुपये अपने मेकअप पर खर्च कर जनता को गुमराह करने का कार्य कर रहे हैं। इसलिए संत समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बदलते मीडिया और बाजार के दौर में आध्यात्मिकता की मूल भावना को किस तरह कायम रखा जाए।
आरोपों से आगे पारदर्शिता की जरूरत
संत समाज से समाज को शांति, संयम, त्याग और सद्भाव का संदेश देने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में संतों के बीच उठने वाले विवाद और आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक रूप से व्यापक जनचर्चा का विषय बनते हैं। गंभीर आरोपों के मामले में तथ्यपरक जांच, पारदर्शिता और संस्थागत संवाद ही ऐसी बहस को सही दिशा दे सकते हैं। आलम यह है कि एक साध्वी द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद एक कथित संत विचलित हो गए और उन्हें परेशान होकर हरिद्वार से बाहर कई दिन बिताने पड़े।
धार्मिक दुनिया में बढ़ता प्रचार, प्रतिस्पर्धा और बाजारवाद केवल संत समाज का आंतरिक विषय नहीं है। यह उस धार्मिक विरासत से भी जुड़ा प्रश्न है, जिसे करोड़ों श्रद्धालु आस्था के साथ देखते हैं। ऐसे में राजराजेश्वरानंद सरस्वती की व्यंग्यात्मक पंक्तियां आज भी एक आईना बनकर सामने आती हैं-साधना और त्याग की जिस परंपरा ने संतों को समाज में सम्मान दिलाया, उसकी कसौटी अंततः प्रचार नहीं, बल्कि आचरण और लोकसेवा ही होनी चाहिए। व्यभिचार में लिप्त रहना, अभक्ष्य भक्षण करना, दूसरों की सम्पत्ति कब्जाना, दलाली और हेराफेरी करना यहां तक की भगवान को छोड़कर राजनेताओ ंकी अपना प्रभाव दिखाने के लिए चरण वंदना तक करना संत का कार्य नहीं है। संत परम्परा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सही संतों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।


