माया के संविधान और परमात्मा के संविधान में क्या अंतर है ?

26 जनवरी यानी भारत का गणतंत्र दिवस है। 26 जनवरी 1950 में हमारे देश का संविधान लागू हुआ था। संविधान क्या है ? जब संसार में कहीं भी कुछ नया होता है तो उसके कुछ नियम बनते हैं । संसार माया है-माया यानी जो आज है, कल नहीं रहेगा- और माया बिना नियम के नहीं चलती । भगवान से ही यह माया बनी है और जहाँ माया है, वहाँ नियम बनना स्वाभाविक है।

तो जब हमारा देश आज़ाद हुआ तब उसका भी संविधान बना यानी उसके नियम तय किए गए। 1947 से पहले भारत का कोई अपना संविधान नहीं था पर जैसे ही देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, यह तय हुआ कि अब अपनी व्यवस्था बनानी होगी। बाबा भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में अन्य सभी सहयोगियों द्वारा नियम बनाए गए और उन्हें एक ग्रंथ का रूप दिया गया जिसे भारत का संविधान कहा।

ब्रह्म यानी परमात्मा, जिसने सृष्टि को बनाया और जो आत्मा के रूप में शरीर के अंदर से उसका संचालन कर रही है, उस बनाने वाले का अपने लिए कोई नियम नहीं है। परंतु जब उसने संसार यानी माया बनाई, तब नियम बने और जब परमात्मा ने मनुष्य को इस संसार में जन्म दिया, तो उसके लिए भी नियम बनाए जिन्हें उपनिषदों और पुराने शास्त्रों में बताया गया।

परमात्मा ने कहा कि मैंने इस संसार में मनुष्य को सिर के बाल से लेकर पाँव के नाखून तक बनाया है। पहला नियम यही है कि मनुष्य का अपने शरीर के ऊपर कुछ भी अधिकार नहीं है। वो उसी का बनाया हुआ है। फिर कहा कि जब मैंने मनुष्य को मुक्त रखा है, फिर वो दूसरों को क्यों बाँधता है! तो सबका मालिक वो एक ही है।

संसार में जो मनुष्य का भाग्य बना या जो कुछ भी प्राप्त हुआ, वो पिछले जन्मों के कर्म और इच्छाओं का परिणाम है। इसलिए उसे स्वीकार करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा, वो भी अच्छा ही होगा। इन्हीं नियमों को श्रुति और स्मृति कहा गया और यही इस संसार, इस जगत का संविधान है ।

लेकिन इसके विपरीत मनुष्य इस नश्वर शरीर को ही अपना मान लेता है, और आसक्त हो जाता है जिसके कारण वो दुखी रहता है और जिसकी वजह से उसे जीवन के अंत में पछताना पड़ता है । जिसने जीवन के इस नियम या संविधान को समझ लिया उसका जीवन सुख-दुख के पार आनंद में आ जाता है और उसका जीवन सफल हो जाता है।

परमात्मा ने ये संविधान श्रुति के रूप में उपनिषदों में दर्ज है। माया के इस खेल के लिए वेद बने। पर यहाँ राजा भी दुखी, प्रजा भी दुखी, दुखिया सकल संसार। तो यहाँ सबको दुख है । यदि कोई व्यक्ति इस संसार की एक भी इच्छा लेकर मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसे फिर इसी दुखी संसार में लौटना पड़ता है, वो अपने असली घर नहीं जा पाता । तब आत्मा कहती है कि जब यह नियम समझ में आ गए तो अब एक ही काम शेष है, वो है परमात्मा से मिलन ।

भारत का संविधान माया की व्यवस्था की बात करता है, भगवान की व्यवस्था की नहीं । देश का संविधान शरीर से संबंधित नियम के बारे में बताता है कि ये इस संसार में कैसे चलेगा । पर भगवान का संविधान आत्मा की बात करता है, जो भीतर है, जो मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। उसी आत्मा के नियम ग्रंथों में दर्ज हैं, जो आगे चलकर श्रुति और स्मृति बने।

इसलिए अब जागने का समय है। देश आज़ाद हुआ तो देश का संविधान लिखा गया। पर मानव कब आज़ाद होगा? क्योंकि उसका भी संविधान श्रुति और स्मृति के रूप में लिखा गया है जिसकी व्याख्या बुद्ध की धम्मपद, महावीर की जिन्नवाणी, गुरु ग्रंथ साहिब, कुरान, बाइबिल और गीता में की है।

आज, इस अवकाश के दिन, अपने आंतरिक संविधान को समझने का अवसर है। उसे पढ़िए, उस पर चिंतन कीजिए और स्वयं को मुक्त कीजिए। तभी यह जन्म वास्तव में सफल होगा।

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