दो ठाकुरों की खामोश लड़ाई, गोलियों की गड़गडाहट से सभी की जुबां पर आई

हरिद्वार। हरिद्वार के गांव नूरपुर पंहनहेड़ी में गोलियों की गूंज से हर कोई सकते में है। लेकिन जुबां खामोश है। दो ठाकुरों में खामोश लड़ाई करीब चार साल से चल रही है। दोनों एक ही राजनैतिक पार्टी भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता है। लेकिन पार्टी संगठन ने इस खामोश लड़ाई में सुलह करने की कोशिश नही दिखाई। परदे के पीछे से इस आग में घी डालने का कार्य बदस्तूर जारी रखा। रंजिश बढ़ी तो नौबत गोलियों की गूंज में सुनाई दी। दो मासूम जिंदगी और मौत से अस्पताल में संघर्ष कर रहे है। प्रकरण में दो लोग गोली लगने से घायल हुए। घायल दोनों लोगों का राजनीति से कोई ताल्लुक नही है। दोनों किसान है। गांव के लोग इस गोलीकांड से बेहद आहत है। लेकिन राजनैतिक वर्चस्व की यह लड़ाई जारी है।


हरिद्वार के गांव नूरपुर पंहनहेड़ी निवासी अमित चौहान एक सामाजिक कार्यकर्ता है। गरीबों की सेवा करना और सामाजिक कार्यो में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना उनकी आदत में शुमार है। पुस्तैनी खेती है। जिसको छोटे भाई सचिन चौहान संभालते है। समाजसेवा से राजनीति में कदम बढ़ाया और भाजपा की सदस्यता ली। भाजपा के विभिन्न पदों पर रहकर पार्टी को मजबूत करने का कार्य किया। समाजसेवा के कार्यो से मिली प्रसिद्धि ने जनता के बीच लोकप्रियता दिलाने का कार्य किया।


इसी गांव के निवासी अतुल चौहान भी भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता है। जबकि उनका भतीजा तरूण चौहान एवीबीपी से भाजपा की सक्रिय राजनीति में आया और वर्तमान में भाजपा का पदाधिकारी है।


लेकिन दो ठाकुरों के बीच रंजिश की शुरुआत जिला पंचायत चुनाव से हुई। भाजपा ने अमित चौहान को नूरपुर पंजनहेड़ी से जिला पंचायत सदस्य का टिकट दे दिया। जबकि अतुल चौहान का टिकट नहीं मिला तो उनको निराशा का सामना करना पड़ा। हालांकि उन्होंने इस टिकट का विरोध किया। लेकिन यह विरोध दबी जुबां से था।


भाजपा के कार्यकर्ता अमित चौहान लोकप्रियता और जनता के विश्वास को चुनाव की जीत में बदलने में कामयाब रहे। अमित को अपने प्रतिद्धंदी से अपेक्षा से अधिक वोट मिले तो जिला पंचायत उपाध्यक्ष की कुर्सी तोहफे में मिली। जिला पंचायत उपाध्यक्ष के पद पर अमित चौहान ने जनता की सेवा में सक्रियता दिखाई और जनता के बीच नजदीकियां बढ़ाई तो उनका राजनीतिक कद बढ़ने लगा। लेकिन टिकट नही मिलने की टीस को दिल में समाए अतुल चौहान सामाजिक और आर्थिक स्तर पर अमित चौहान के खिलाफ रणनीति बनाने लगे।


अतुल चौहान और उनका भतीजा तरूण चौहान ने अमित चौहान को ठिकाने लगाने का दांव चला शुरू किया। चूंकि अमित चौहान प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े थे तो अतुल चौहान ने अमित चौहान के प्रॉपर्टी कारोबार को नुकसान पहुंचाने के लिए आर्थिक चोट करनी शुरू कर दी।


अमित चौहान के द्वारा निर्मित तमाम कॉलोनियों के खिलाफ शिकायतों सिलसिला शुरू कर दिया। जिला प्रशासन, एचआरडीए और तमाम प्रशासनिक स्तर पर जमीनों की खरीद फरोख्त से लेकर लैंड यूज चैंज और अवैध कॉलोनी के नाम पर शिकायतों की एक लंबी श्रंखला शुरू कर दी। अमित चौहान तमाम नोटिसों का जबाब देते रहे और यह लड़ाई कागजी चलती रही।


इस कागजी कार्रवाई के चलते अमित चौहान की निर्मित कॉलोनी में रहने वाले तमाम लोगों को प्राधिकरण के नोटिस आने शुरू हो गए। कई कालोनियां सील कर दी गई। सैंकड़ों मकान मालिकों को नोटिस मिल गए। क्षेत्र की जनता अतुल चौहान की कारगुजारियों से आजिज हो गई। जनता के बीच अतुल की छवि विरोधी व्यक्ति की नजर आने लगी और जनता का विश्वास अतुल से पूरी तरह से उठने लगा।


लेकिन अतुल ने राजनीति के बड़े दिग्गज नेताओं को अपने घर पर बुलाकर गांव में भौकाल कायम रखा। बड़े नेताओं का संरक्षण मिलने का दावा ग्रामीणों से किया जाता रहा। गांव वाले चुपचाप तमाशा देखते रहे। लेकिन रंजिश का मामला यहां पर नहीं रुका और अतुल ने पीआईएल के माध्यम से कोर्ट के माध्यम से दस्तक दी और सैंकड़ों परिवारों और ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान पहुंचा दिया।


अमित चौहान का प्रॉपर्टी कारोबार प्रभावित हुआ और वह धैर्य से सबकुछ सहन करते रहे। प्रॉपर्टी कारोबार से राजनीति में आना अमित चौहान को भारी पड़ा और आर्थिक नुकसान झेलते रहे।


जिसके बाद अमित चौहान ने अपने कारोबार को संचालित करने के लिए उषा टाउनशिप के नाम से एचआरडीए से अधिकृत कॉलोनी में कार्य शुरू किया। इस कॉलोनी का कार्य पूर्ण होने लगा तो अतुल चौहान को अमित चौहान की आर्थिक मजबूती खटकने लगी।


अतुल चौहान ने उषा टाउनशिप की शिकायत प्राधिकरण और जिला प्रशासन से करनी शुरू कर दी। इसी की पैमाइश करने के लिए तहसील प्रशासन और एचआरडीए की टीम पहुंची और संतुष्टि जाहिर कर दी। लेकिन तहसील प्रशासन की रिपोर्ट पर आपत्ति जाहिर करते हुए अतुल चौहान ने एक बार फिर से प्रशासन की टीम को मौके पर उषा टाउनशिप बुलाया।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब तहसील प्रशासन की टीम मौके पर मौजूद थी तो अतुल चौहान और तरूण चौहान लाईसेंसी पिस्ट्रल लेकर क्यो आए। इससे साफ जाहिर है कि वह दोनों गोली चलाने का इरादा लेकर पहुंचे। जबकि दूसरे पक्ष अमित चौहान के पास भी लाईसेंसी पिस्ट्रल है। जबकि घटना के वक्त उनके पास नही था।

अमित चौहान की मंशा साफ भी कि प्रशासन की टीम अपना सरकारी कार्य पूर्ण करेंगा। उनको कोई आपत्ति नही थी। अगर घटनास्थल पर अमित चौहान के पास भी असलाह होता तो खूनी संघर्ष बड़ा भयावह होता। जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता।


अमित चौहान के धैर्य ने मामले को शांत रखा और अतुल चौहान की हठधर्मिता ने ठाकुरों के वर्चस्व की जंग को हवा दी। सवाल यह है कि ठाकुरों की यह जंग अब कब और कहां जाकर रूकेगी।

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