स्वामी गोविन्दानंद सरस्वती का दावा: स्वामी अविमुक्तेश्वरांनद हैं फर्जी शंकराचार्य

सर्वोच्च न्यायालय ने लगायी है रोक, अन्य संतों ने भी बताया फर्जी
हरिद्वार।
प्रयागराज में मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ कथित अभद्रता के मामले और माघ मेला प्रशासन द्वारा उन्हें नोटिस देकर इस बात के साक्ष्य मांगना की वह शंकराचार्य है, के बाद विवाद बढ़ता ही जा रहा है। कई संत स्वामी अविमुक्तेश्वरांनद सरस्वती के समर्थन में हैं तो कई विरोध में बयान दे रहे हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शंकराचार्य हैं या नहीं यह मामला फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। बावजूद इसके स्वामी गोविन्दानंद सरस्वती महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को फर्जी शंकराचार्य बताया है। उनका कहना है कि वे सांसारिक हैं और वह शंकराचार्य नहीं हैं। कोर्ट ने उनके शंकराचार्य पदनाम का प्रयोग करने पर रोक लगायी हुई है।


इसके साथ ही श्री पंच शंभू दशनाम अखाड़े के श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने भी स्वमी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को फर्जी शंकराचार्य बताते हुए कहाकि यह दुःखद है कि चंद कंाग्रेसी ज्योतिष्पीठ पर फर्जी शंकराचार्य बनाकर ज्योतिष्पीठ मंे विवाद उत्तपन्न करने में लगे हैं। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य हमेशा गिरि नामा के होते हैं। कारण की ज्योतिष्पीठ मठ गिरि, पर्वत, सागर नामक साधुओं का है। विगत 160 वर्ष तक जोशीमठ की गद्दी रिक्त रही। जिस पर लोगों ने कब्जा कर लिया था। जिसे स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने मुकदमा लड़कर खाली कराया था। ज्योतिष्पीठ की गद्दी गिरि नामा है। ऐसे में सरस्वती नामा का वहां बैठना ही गलत है। सन् 805 में टोटकाचार्य स्वामी आनन्द गिरि ज्योतिष्पीठ के प्रथम आचार्य हुए। उन्होंने कहा कि यह विवाद वर्षों से चला आ रहा है।


कहाकि ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य कौन होगा यह श्री पंचायती अखाड़ा आवाह्न, श्री पंचायती अखाड़ा अटल व श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी तय करे। कहा कि यह तीनों अखाड़े ही शंकराचार्य जी के साथ रहे हैं। उस समय अन्य कोई अखाड़ा अस्तित्व में नहीं था।


वहीं दूसरी ओर विचार करें तो देश में शंकराचार्य पदनाम का उपहास उड़ाया जा रहा है। आज सैंकड़ों की संख्या में शंकराचार्य बने घूम रहे हैं। जिनमें से अधोक्षजानंद, वासुदेवानंद गिरि, अच्युतानंद तीर्थ (जिन्होंने बाद में पद का त्याग कर दिया), शंकरानंद, राजराजेश्वराश्रम, विश्वदेवानंद तीर्थ, नरेंद्रानंद सरस्वती, नागेंद्राश्रम, ओमकारानंद, नृसिंह भारती, प्रज्ञानांनद सरस्वती (इन्होंने भी शपथपत्र देकर बाद में स्वंय को शंकराचार्य की दौड़ से हटा लिया)। इनमें से कुछ सरकारी शंकराचार्य हैं। जिन्हें सरकार शंकराचार्य कहकर पूर्ण सम्मान देती है। उक्त के अतिरिक्त दर्जनों शंकराचार्य बनकर घूम रहे हैं। जबकि देश में चार पीठ के चार ही शंकराचार्य मान्य हैं। चार के अतिरिक्त स्वंय को शंकराचार्य बताने वाला केवल पाखण्डी है।


अब रही बात स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की तो यह मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। कौन शंकराचार्य असली है और कौन नकली इसका फैसला न्यायालय करेगा।

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