शंकराचार्य विवाद: वसीयत और पद के जाल में फंसते नजर आ रहे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

हरिद्वार। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर उपजा विवाद बढ़ता ही जा रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर संत समाज भी दो फाड़ नजर आ रहा है। एक वर्ग स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानने से इंकार कर रहा तो एक वर्ग स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बता रहा है, जबकि मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।


ज्योतिष पीठ को लेकर चला आ रहा विवाद कोई नया नहीं है। वर्षों से इस पीठ को लेकर विवाद चल रहा है। स्वामी शांतनदं के ब्रह्मलीन होने के बाद उनकी वसीयत को अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यों से अमान्य करार दिया। इस पीठ को लेकर स्वामी वासुदेवानंद महाराज व स्वामी स्वरूपानंद के बीच विवाद हुआ। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने हाईकोर्टं इलाहाबाद में उनके पद को चुनौती देते हुए मामला दाखिल कर दिया। सन् 2017 में जस्टिस सुधीर अग्रवाल की पीठ ने हाईकोर्ट का निर्णय सुनाते हुए स्वामी वासुदेवानंद को शंकराचार्य का पद धारण करते समय सरकारी अध्यापक होने के कारण संन्यासी नहीं माना? इस कारण उनके विरुद्ध निर्णय दिया। परंतु उसी निर्णय में स्वामी स्वरूपानंद को भी शंकराचार्य नहीं माना गया था। निर्णय के अनुसार जब तक समुचित रूप से शंकराचार्य की नियुक्ति नहीं हो जाती तब तक के लिए स्वामी स्वरूपानंद को शंकराचार्य का छत्र प्रयोग करने की अनुमति दे दी गयी थी। यानि की एक तरह से कार्यवाहक शंकराचार्य। एक पद पर बैठा व्यक्ति कार्यवाहक के रूप में कार्य कर रहा है तो उसे तो वसीयत का अधिकार ही नहीं है।


हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध स्वामी वासुदेवानंद और स्वामी स्वरूपानंद दोनों ने अपील दाखिल की। अपील में यथास्थिति का अंतरिम आदेश चला आ रहा है। स्वामी स्वरूपानंद महराज एक प्रकार से हाईकोर्ट के आदेश से शंकराचार्य पद के सिर्फ छत्र का प्रयोग करने के अधिकारी बने! वो भी अस्थायी रूप से। अब ऐसे में उनके शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद और स्वामी सदानदं की नियुक्ति को कैसे वैध ठहराया जा सकता है।


स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती को अस्थायी रूप से सिर्फ शंकराचार्य के छत्र का उपयोग करने की अनुमति मिली थी। और दोनों के द्वारा दाखिल अपील में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश चला आ रहा है, तो स्वामी स्वरूपानंद महराज वसीयत द्वारा… नया शंकराचार्य कैसे नियुक्ति कर सकते हैं?

न्यायालय में पुरी के शंकराचार्य का शपथ पत्र भी प्रस्तुत किया गया है। जिसमें कहा गया है कि उनके द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य पद के लिए कभी भी अनुमोदन नहीं किया गया ? वहीं दूसरी ओर ज्योतिषपीठ गिरि, पर्वत और सागर नामा संन्यासियों का है तो वहां सरस्वती नामा कैसे शंकराचार्य बन सकता है।


यहां गौर करने वाली बात यह है कि शंकराचार्य का पद कोई सम्पत्ति नहीं है, कि वसीयत द्वारा अंतरित कर सकते हैं। वसीयत सम्पत्ति की हो सकती है, पद की नहीं और शंकराचार्य पद किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं होता। जिस प्रकार से देश संविधा से चलता है ठीक उसी प्रकार से शंकराचार्य बनने का भी एक संविधान है, जिसके लिए आदी शंकराचार्य ने मठाम्नाय महानुशासन में स्पष्ट रूप से लिखा है।

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