हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में अखाड़ों और संतों द्वारा लगातार जगतगुरु, शंकराचार्य और महामंडलेश्वर जैसे शीर्ष धार्मिक पदों की घोषणाओं को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अब एक अखाड़े के संत ने इन नियुक्तियों पर आपत्ति जताते हुए Uttarakhand High Court में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने की तैयारी की है।
महंत का आरोप है कि कुछ अखाड़े और संत सनातन परंपराओं की मर्यादा और स्थापित मानकों की अनदेखी करते हुए ऐसे व्यक्तियों को जगतगुरु और शंकराचार्य घोषित कर रहे हैं, जो पारंपरिक धार्मिक, दार्शनिक और आचार संबंधी कसौटियों पर खरे नहीं उतरते। उनका कहना है कि इन पदों का वितरण “रेवड़ियों की तरह” किया जा रहा है, जबकि इनकी नियुक्ति के लिए स्पष्ट धार्मिक परंपराएं और शास्त्रीय मानदंड निर्धारित हैं।
याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे संत का कहना है कि जिन संस्थाओं या व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्ति का अधिकार ही नहीं है, वे सार्वजनिक रूप से उपाधियां प्रदान कर रहे हैं, जिससे संत समाज और सनातन परंपरा की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे आम श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और धार्मिक संरचना की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है।
संत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय की शरण में जाने का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि धार्मिक पदों की गरिमा और पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा करना है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में ऐसे पदों का महत्व समाप्त हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित पीआईएल में संबंधित अखाड़ों और संतों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की जाएगी तथा यह आग्रह किया जाएगा कि न्यायालय स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि बिना वैधानिक या पारंपरिक अधिकार के कोई भी संस्था शीर्ष धार्मिक उपाधियों की घोषणा न कर सके।
इस घटनाक्रम के बाद संत समाज और अखाड़ों के बीच बहस तेज हो गई है। कई संत इस पहल का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का प्रयास मान रहे हैं। आने वाले दिनों में मामला औपचारिक रूप से Uttarakhand High Court में दाखिल होने के बाद इस पर व्यापक चर्चा की संभावना है।


