महाशिवरात्रि: भीतर के महाशिव को जगाने का पर्व

कहा गया है—महाशिवरात्रि। महा यानी महान, और शिवरात्रि यानी शिव की रात। अर्थात महान शिव की रात। लेकिन प्रश्न यह है कि शिव को महान क्यों कहा गया? आज पूरा संसार महाशिवरात्रि मना रहा है। लोग मंदिरों में जाते हैं, जल चढ़ाते हैं, दूध, शहद, बेलपत्र और बेर अर्पित करते हैं। तिलक लगाते हैं, “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं और व्रत भी रखते हैं। पर इन सभी कर्मकांडों के पीछे असली कारण क्या है? साल में केवल एक रात को शिव की महानता क्यों याद की जाती है, जबकि शिव तो सदा महान थे, हैं और रहेंगे।

शास्त्रों और कथाओं में कई कथाएँ मिलती हैं—कि आज शिव-पार्वती का विवाह हुआ, कि आज समुद्र मंथन हुआ, कि आज सृष्टि का आरंभ हुआ। लेकिन इन घटनाओं का हमारे जीवन के लिए क्या संदेश है, यह समझना अधिक आवश्यक है। शिव किस चीज के दाता हैं?

वास्तव में हर रात शिव की ही है, क्योंकि शिव काल हैं और महाकाल हैं। उन्हें मृत्यु का देवता कहा गया है। अब प्रश्न यह है—क्या हम मृत्यु चाहते हैं या अमरता की खोज में हैं?

ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों का संगम ही परमात्मा है। ‘ॐ’ का अर्थ भी यही है। ‘अ’ यानी ब्रह्मा—जो सृष्टि की रचना करते हैं। ‘उ’ यानी विष्णु—जो पालन करते हैं। और ‘म’ यानी शिव—जो संहार और मृत्यु का कार्य करते हैं। शिव को अर्धनारीश्वर क्यों कहा गया? क्योंकि शिव और पार्वती का मिलन ही प्रकृति और पुरुष का मिलन है। शिव स्वयंभू हैं—वे स्वयं प्रकट हुए। जब परम सत्य एक ही है, तो वही ब्रह्मा में है, वही विष्णु में है और वही शिव में है। एक से तीन की अभिव्यक्ति हुई और सृष्टि का निर्माण हुआ।

शिव को संहार का कार्य इसलिए दिया गया, ताकि नया सृजन संभव हो सके। वही शिव समय-समय पर संसार में अवतार लेते रहे—कभी राम बनकर, कभी कृष्ण, बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद, कबीर, फरीद, मीरा, सहजो, लल्ला और राम परमहंस के रूप में। प्रश्न यह है कि शिव हमसे कौन-सा जल चढ़ाने को कहते हैं? वह जल हमारे भीतर के विकारों का है, क्योंकि भीतर ही समुद्र मंथन होना है।

शिव स्वयं सागर हैं, अमृत हैं, गंगा हैं। शिव हमारे भीतर ही विराजमान हैं और हमारे विष को पीने के लिए तैयार बैठे हैं। समुद्र मंथन की कथा हम सभी जानते हैं। देवता और दानवों ने पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से सागर का मंथन किया। उस मंथन से अनेक रत्न निकले, और अंत में अमृत प्रकट हुआ। अमृत का अर्थ है—अमरता। जो अमृत को पा ले, वह अमर हो जाता है। लेकिन उसी मंथन से विष भी निकला।

अब प्रश्न उठा—उस विष को कौन पिएगा? यदि अमृत और विष मिल गए, तो अमृत का मूल्य ही नष्ट हो जाएगा। उस विष को पीने का साहस केवल शिव ने किया। इसलिए उन्हें महादेव कहा गया, महान कहा गया। शिव ने विष को अपने कंठ में धारण किया और संसार को बचाया।

ब्रह्म से पूरी सृष्टि की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा विष्णु की नाभि से प्रकट हुए और शिव माथे से। इसीलिए शिव को ब्रह्मस्वरूप भी कहा गया। शिव बाहर नहीं, भीतर हैं। लेकिन शिव को पाने के लिए शरीर की पहचान से ऊपर उठना होगा। और शरीर से ऊपर उठने के लिए सत्य के सतगुरु की शरण आवश्यक है, जो तत्वज्ञान प्रदान करे।
इस महाशिवरात्रि पर संकल्प लें कि हमें भीतर के महाशिव को प्रकट करना है। शरीर से ऊपर उठना है। कहा गया है—जो जीते-जी राख हो गया, वही अमर हो गया। जिसने अपने अहंकार को जीते-जी भस्म कर दिया, वही शिव हो गया। तब यह जन्म शिव के संग पूर्ण हो जाता है।

शिव ही सत्य हैं और सत्य ही सुंदर है। जब सत्य जीवन में उतरता है, तो जीवन में सुंदरता आ जाती है। तब मनुष्य उसी सुगंध में नाचता है, झूमता है और अंततः इस लोक से पारब्रह्म लोक तक की यात्रा पूरी करता है। तभी यह मनुष्य जन्म वास्तव में सफल होता है।

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