हरिद्वार। आगामी महाकुंभ, अर्द्धकुंभ और अखाड़ा परिषद से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए हरिद्वार के भूपतवाला स्थित शांभवी पीठ में एक विशेष शास्त्र चर्चा का आयोजन किया गया। इस दौरान विद्वानों और संतों ने कुंभ मेला आयोजन, शंकराचार्य बनने की अर्हताएं, अखाड़ों के कर्तव्य तथा सन्यास दीक्षा की योग्यता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।

शास्त्र चर्चा में उपस्थित विद्वानों ने एकमत से ‘देवभूमि विद्वत् परिषद्’ के गठन का निर्णय लिया। परिषद का उद्देश्य सनातन परंपराओं, शास्त्रीय मर्यादाओं और धार्मिक पदों की नियुक्ति से जुड़े सिद्धांतों के संरक्षण तथा उनके पालन को सुनिश्चित करना रहेगा।
चर्चा के दौरान विद्वानों ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि शंकराचार्य पद पर नियुक्ति ‘मठाम्नाय’ के सिद्धांतों के अनुसार ही की जानी चाहिए और इसके पालन में किसी प्रकार की ढील नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह पद सनातन धर्म की सर्वोच्च आध्यात्मिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए इसकी गरिमा और नियमों का कठोरता से पालन आवश्यक है।

इसके अलावा अखाड़ों की परंपराओं और कर्तव्यों पर भी चर्चा हुई। विद्वानों ने कहा कि बिना ‘प्रेयश मंत्र’ के किसी को भी सन्यासी नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि सन्यास की दीक्षा शास्त्रीय विधि और मर्यादाओं के अनुरूप ही दी जानी चाहिए।

इस अवसर पर शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप जी महाराज ने सभी विद्वानों का फूलमालाओं और पटका पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में कई विद्वान और संत उपस्थित रहे, जिन्होंने अपने विचार रखते हुए सनातन धर्म की परंपराओं को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
शास्त्र चर्चा में प्रमुख रूप से प्रो. मोहन चन्द्र बलोदी, डॉ. भोला झा, प्रो. राधेश्याम चतुर्वेदी, डॉ. दिनेश चन्द्र पाण्डेय, डॉ. पदम प्रसाद सुवेदी, डॉ. ओमप्रकाश भट्ट, डॉ. हरिगोपाल शास्त्री तथा डॉ. गोविंद रामचन्द्र गोविंद वैजापुरकर, डॉ बलदेव प्रसाद चमोली, डॉ नवीन चंद्र पंत, डॉ कंचन तिवारी सहित अन्य विद्वानों ने प्रतिभाग किया।
विद्वानों ने कहा कि आने वाले कुंभ और अर्द्धकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों को शास्त्रीय परंपराओं और अनुशासन के साथ संपन्न कराने के लिए संत समाज और विद्वत समाज को मिलकर कार्य करना होगा।


