स्वंयभू संस्था बन कर रहे सनातन धर्म की हानि
हरिद्वार। भूमा निकेतन के प्रबंधक राजंेन्द्र शर्मा ने प्रेस का जारी बयान में कहाकि धर्म, धर्म स्थल, धर्म ग्रन्थ, धर्म संस्कृति और धार्मिक परम्पराओं की रक्षा के लिए आदि जगद्गुरु शंकराचार्य महाराज ने विधर्मियों को शास्त्र से हराकर सनातन धर्म की रक्षा की थी। जो विधर्मी शास्त्र से नहीं माने, उन्हें मनाने और सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाडों का गठन कर शस्त्र चलाने का कार्य अखाड़ो को सौंपा गया।
विभिन्न धार्मिक संगठनों ने खासकर कुम्भ व अर्द्धकुम्भ मेलां में साधु-सन्तों के झगडों एवं खुनी टकराव से बचने के लिए सभी अखाड़ों ने मिलकर अखाड़ा परिषद् की स्थापना की। परन्तु अब यह अखाड़ा परिषद न होकर, यह एक झगड़ा परिषद् बन गया है। जब तक ये अखाड़े, जगद्गुरु शंकराचार्य के बनाये अनुशासन में चलते रहे तब तक सब ठीक चलता रहा, परन्तु अब इन्होंने अपनी मनमानी प्रारम्भ कर दी तो यह व्यवस्था गड़बड़ा गई। क्योंकि अब यें, न तो शंकराचार्य को ही मानते हैं और न ही उनकी परम्परा को।
उन्होंने कहाकि ये स्वयंभू अखाड़ा परिषद है। अब तो इसका नाम झगड़ा परिषद् कर देना भी अनुचित लग रहा है। उन्होंने कहाकि मठों पर आसीन शंकराचार्य भी अखाड़ा परिषद के झगडे पर चुप्पी साधे हैं, जबकि इनके झगडे से सनातन धर्म को बहुत बड़ी हानि हो रही है। उन्होंने कहाकि जो स्वयं ही संगठित नही रह सकते, वें समाज को संगठित रहने का उपदेश कैसे दे सकते हैं। कहाकि सैद्धान्तिक रुप में सन्तों का राजनीतिक दलों से कोई सम्बन्ध नही होता, यह धार्मिक परम्परा भी नहीं है।
श्री शर्मा ने कहाकि सरकार ने अखाड़ा परिषद के पदाधिकारियों को सुरक्षा देने की बात कही थी, अब सरकार को बताना चाहिए कि कौन से अखाडा परिषद के पदाधिकारियों को सुरक्षा देगी। कुम्भ मेले के दौरान दी गई एक-एक करोड़ की जो धनराशि अखाडांे को दी है उसके खर्चे के पाई-पाई का हिसाब जनता के समक्ष रखना चाहिए। क्योंकि वह पैसा जनता की खून-पसीने की कमाई का है। उन्होंने कहाकि सरकार का काम है समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा करना, परन्तु इस कुम्भ मेले में राज्य सरकार द्वारा धनाढ्î लोगों को एक-एक करोड़ की धनराशि देकर वित्तीय अनियमित्ता की गई है। इस वित्तिय अनियमित्ता की सीबीआई से जांच करायी जानी चाहिए।
उन्होंने कहाकि अखाड़ा परिषद्, कोई पंजीकृत संगठन नहीं है, न इसकी कोई नियमावली है और न ही इनका कोई अधिकृत कार्यालय है। इनका भारतवर्ष में कोई बैंक खाता है भी या नह। अखाड़ा परिषद, अपने आय-व्यय का कोई ब्यौरा भी नहीं रखती, न ही इन्कम टैक्स विभाग में वित्तीय वर्षों का अपना लेखा-जोखा, बैलेन्स सीट, आडिॅट रिपोर्ट आदि प्रेषित करती है।
ये सब घोर वित्तीय अनियमित्तायें हैं। यदि अखाड़ा परिषद् उक्त वित्तीय नियमों का पालन करती है तो अखाड़ा परिषद् को उक्त के सम्बन्ध में अपना स्पष्टीकरण सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहाकि यदि अखाड़ा परिषद स्पष्टीकरण नहीं देती है तो वे न्यायालय में जाने के लिए विवश होेंगे।


अखाड़ा नहीं झगड़ा परिषद बन गयी संतों की संस्था
