करीब 11 अखाड़ों के संतों के जुटने से जगी थी उम्मीद, अंतिम दौर में अटकी सहमति; दो धड़ों में बंटी अखाड़ा परिषद को एक करने की कोशिशों को झटका लगने के संकेत
हरिद्वार। मां गोदावरी के उद्गम स्थल और भगवान त्र्यंबकेश्वर की पावन भूमि नासिक में संतों की एकजुटता की उम्मीद जगाने वाली बैठक अब एक बार फिर सवालों के घेरे में है। लंबे समय से अलग-अलग धड़ों में बैठकर अपनी गतिविधियां संचालित कर रहे संतों के एक मंच पर जुटने से लगा था कि वर्षों पुरानी खाई पटने जा रही है। बातचीत आगे बढ़ी, सहमति की उम्मीद बनी और बैठक की तस्वीरों ने भी एकता की नई कहानी बयां की, लेकिन चर्चा के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते पद की चाह ने पूरी कवायद पर पानी फेरने के संकेत दे दिए। कुल मिलाकर पतन का कारक कहे जाने वाले मोह ने सब गुड गोबर की दिया।
संत समाज में एकता की इस कोशिश को लेकर उत्साह जरूर था, मगर सूत्रों के हवाले से सामने आ रही चर्चाएं बताती हैं कि जिस सहमति तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही थी, वह अंतिम दौर में उलझती नजर आई। जिस एकता के लिए कई महीनों से प्रयास किए जा रहे थे, उसके सामने पद और नेतृत्व का सवाल फिर बड़ी बाधा बनकर उभरने की बात कही जा रही है। हालांकि, बैठक के नतीजे और कथित मतभेदों को लेकर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
एक मंच पर आए संत, उम्मीदों को लगे थे पंख
नासिक में हुई बैठक में करीब 11 अखाड़ों के संतों के शामिल होने की बात सामने आई है। बैठक का उद्देश्य संतों के बीच संवाद बढ़ाने और लंबे समय से अलग-अलग चल रहे संगठनों के बीच एकता की संभावनाएं तलाशना बताया जा रहा है। चर्चा के दौरान जिस तरह बातचीत आगे बढ़ी, उससे यह उम्मीद बनने लगी थी कि इस बार संत समाज किसी ठोस नतीजे तक पहुंच सकता है।
बैठक की सार्वजनिक हुई तस्वीरों में संतों का एक मंच पर नजर आना भी एकजुटता के संदेश के रूप में देखा गया। तस्वीरों से लगा कि आपसी मतभेदों को पीछे छोड़कर संत समाज एक साझा राह चुनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन तस्वीरों में दिखी नजदीकियों और बातचीत के वास्तविक नतीजे के बीच कितना फासला रहा, यह अब चर्चा का विषय बन गया है।
विश्वसनीयता सूत्रों के अनुसार, वार्ता के अंतिम चरण में पद और नेतृत्व को लेकर पेच फंसने से सहमति की राह मुश्किल हुई। सूत्रों का दावा है कि एकता की उम्मीदों के बीच पद की दावेदारी निर्णायक सवाल बन गई। हालांकि, किस पद को लेकर किस पक्ष ने क्या शर्त रखी, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इस बार भी एकता के बीच कहीं न कहीं संतों की केकई बड़ी बाधा का कारण बनी।
वर्षों से दो धड़ों में बंटी है अखाड़ा परिषद
संत समाज की इस पूरी कवायद के केंद्र में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की एकता का सवाल है। परिषद लंबे समय से दो अलग-अलग धड़ों में बंटी हुई है। दोनों पक्षों की अलग-अलग गतिविधियों और नेतृत्व की स्थिति के बीच एक साझा मंच और सर्वमान्य व्यवस्था बनाने की कोशिशें समय-समय पर होती रही हैं।
ऐसे में नासिक की बैठक को सामान्य मुलाकात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा था। संतों के एक मंच पर आने से यह संदेश निकलने की संभावना थी कि मतभेदों के बावजूद सामूहिक नेतृत्व की राह निकाली जा सकती है। लेकिन अगर अंतिम सहमति पद के सवाल पर अटकती है, तो यह एकता के प्रयासों के सामने खड़ी पुरानी चुनौती का भी संकेत होगा।
त्याग और परोपकार के संदेश के बीच पद की खींचतान पर सवाल
संत समाज की पहचान त्याग, तपस्या, सेवा, परोपकार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जुड़ी रही है। ऐसे में संगठनात्मक एकता की कोशिशों के बीच पद और नेतृत्व की दावेदारी का सवाल उठना स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है।
सवाल यह है कि क्या वर्षों से चली आ रही दूरियों को मिटाने के लिए नेतृत्व की व्यवस्था पर कोई ऐसा सर्वमान्य रास्ता नहीं निकाला जा सकता, जिसमें व्यक्तिगत दावेदारी से अधिक संगठन की प्रतिष्ठा को महत्व मिले? क्या पद की जिम्मेदारी को सेवा के रूप में देखने की पहल एकता की राह आसान कर सकती है?
फिलहाल सामने आ रही चर्चाओं के आधार पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि नेतृत्व और पद का प्रश्न एकता की राह में बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।
इतना जरूर है कि अखाड़ों के बीच समन्वय और सामूहिक नेतृत्व का सवाल नया नहीं है। धार्मिक आयोजनों, परंपराओं और विभिन्न अखाड़ों के प्रतिनिधित्व के बीच परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में परिषद की एकता का सवाल केवल पदाधिकारियों तक सीमित नहीं, बल्कि संत समाज की सामूहिक छवि और निर्णय प्रक्रिया से भी जुड़ा है।
अब आगे क्या निकलेगा रास्ता?
नासिक की बैठक के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संतों के बीच एकता की कोशिशें दोबारा गति पकड़ेंगी या पद और नेतृत्व को लेकर मतभेद एक बार फिर इस पहल को पीछे धकेल देंगे। बैठक में बनी सहमति, असहमति और आगे की रणनीति को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।
फिलहाल एक मंच पर जुटे संतों की तस्वीरें एकता की उम्मीद जरूर जगाती हैं, मगर बैठक के परिणाम को लेकर उठ रहे सवाल यह भी बताते हैं कि एकजुटता केवल साथ बैठने से नहीं, बल्कि साझा निर्णय और आपसी विश्वास से कायम होती है।
कई महीनों की मेहनत के बाद अगर बात फिर पद की चौखट पर आकर ठहरती है, तो संत समाज के सामने आत्ममंथन की जरूरत और बढ़ जाती है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नासिक में जगी एकता की उम्मीद आगे बढ़ती है या नेतृत्व की उलझनें एक बार फिर बने-बनाए खेल को बिगाड़ देती हैं। जिस प्रकार के संकेत मिल रहे हैं, उनके आधार पर अब एकता की उम्मीद कम नजर आ रही है।

