गजब हाल संन्यास का……..लो एक और पैदा हो गए जगद्गुरु

कुमार स्वामी के बाद अब आचार्य प्रमोद कृष्णम को बनाया जगद्गुरु
भज गोविन्दम् ग्रंथ में आदी गुरु शंकराचार्य भगवान ने कलियुग में ढोगियों का बोलबाला होगा, ऐसा वर्णन किया था। वर्तमान में वह सही साबित हो रहा है। आज ढ़ोंगी बाबा ढ़ोगियों को बनाकर स्वंय का गुणगान करने पर आमादा है। फर्जी शंकराचार्य का विवाद अभी थमा नहीं था कि एक और जगद्गुरु को उत्पन्न कर दिया गया।


कल्कि पीठाधीश्वर स्वामी प्रमोद कृष्णम को जगद्गुरु की उपाधि से अंकृत कर दिया गया। इससे पहले एक गृहस्थ महामण्डलेश्वर स्वामी कुमारानंद सरस्वती को प्रयागराज कुंभ में जगद्गुरु की उपाधि प्रदान कर दी गयी। उपाधि प्रदान करने वाले वही लोग थे, जो आज स्वामी अविमुक्तेश्वरांनद को फर्जी बता रहे हैं। यदि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद फर्जी शंकराचार्य हैं तो प्रमोद कृष्णम व कुमारानंद सरस्वती कैसे जगद्गुरु हो सकते हैं। जबकि कुमारानंद सरस्वती अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाते हैं। यहां तक की उन्होंने अपने मंच से अजान भी लगवायी थी। वहीं आचार्य प्रमोद कृष्णम भी गृहस्थ है और उन्होंने संन्यास दीक्षा नहीं ली है।


इस संबंध में शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य स्वामी गोविन्दानंद सरस्वती महाराज ने कहाकि जगद्गुरु लिखने का अधिकार केवल और केवल आदी शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों के प्रमाणित आचार्यों को ही है। जगद्गुरु बनने के लिए भाष्यकार और वेद-वेदांत में प्रवीण होना भी अनिवार्य है।


उल्लेखनीय है कि आनंदपीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर बालकानंद गिरि महाराज कल्किपीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम महाराज को जगद्गुरु पद से अलंकृत करने का प्रस्ताव श्रीमहंत रवींद्र पुरी महाराज (अध्यक्ष अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद्, अध्यक्ष श्री माँ मनसा देवी ट्रस्ट, सचिव पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी) के समक्ष रखा, जिस पर उन्होंने सहर्ष सहमति व्यक्त कर दी एवं समस्त संत समाज द्वारा विधिवत वैदिक रीति से पट्टाभिषेक कर दिया गया।


यह ठीक चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर हुआ। इस अवसर को ऐतिहासिक क्षण को सनातन परंपरा का स्वर्णिम अध्याय तक बता दिया गया। जब स्वामी अविमुक्तेश्वरांनद शंकराचार्य नहीं हो सकते तो आचार्य प्रमोद कृष्णम को कैसे जगद्गुरु बना दिया गया। जबकि विद्वता में आचार्य प्रमोद कृष्णम स्वामी अविमुक्तेश्वरांनद के पांसग भी नहीं टिकते।
कहा गया कि शास्त्रीय पद्धति से संपन्न पट्टाभिषेक अनुष्ठान केवल एक पद अलंकरण नहीं, बल्कि सनातन धर्म की अखंड ज्योति को विश्वपटल पर प्रज्वलित रखने का संकल्प है एक ऐसा दिव्य क्षण, जिसने श्री कल्किधाम, संभल को धर्म इतिहास के उज्ज्वल नक्षत्रों में स्थापित कर दिया है।


बता दें कि धार्मिक आस्था के सर्वोच्च पद आज कल पद रेवड़ियों के भाव हो गए हैं। जैसा दाम वैसा पद। यह हाल उनका है, जो स्वंय को त्यागी और सबसे बड़ा विद्वान कहते नहीं अघाते। जिस प्रकार का आचरण दिखायी दे रहा है, उसको देखते हुए गृहस्थ आजकल के कुछ भगवाधारियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *