हरिद्वार। हरिद्वार संत बाहुल्यनगरी है। यहां भांति-भांति के सम्प्रदायों, अखाड़ों के महामण्डलेश्वर, महंत आदि है। बड़ी संख्या में यहां इनके आश्रम, मठ मंदिर हैं। इनमें भांति-भांति चरित्र के भगवाधारी हैं। इनमें एक महामण्डलेश्वर ऐसे हैं, जिनका कार्य केवल दूसरों को प्रमाणपत्र बांटना और लोगों ने उगाही करना है। वेसे यह ऐसे महामण्डलेश्वर हैं, जिन्होंने मां और बेटी दोनों को ही नही छोड़ा। ये इतने बड़े कलाकार हैं कि कहीं कोई विवाद हो तो ये महाशय वहां बिन बुलाए मेहमान की तरह वहां पहुंच जाते हैं और बिना दलाली लिए नहीं लौटते। कुछ समय पूर्व इन्होंने एक संत की नस दबायी और उसका पीछा छोड़ने के लाखों रुपये ले लिए।
इतना ही नहीं एक होटल के निर्माण में भी इन मण्डलेश्वर ने अपनी टांग अड़ायी और मध्यस्तता के बाद रुपये लेकर होटल स्वामी का पीछा छोड़ा। सबसे बड़ी बात यह की लोग तो आम आदमी को ठगते हैं, किन्तु इन महाशय ने तो एक बड़े अधिकारी को भी ठगने की कोशिश। महामण्डलेश्वर ने एक मूर्ति निर्माण के लिए पांच लाख का प्रस्ताव दिया। उसके कुछ समय बात मूर्ति की कीमत इन्होंने सात लाख कर दी। सात लाख में भी अधिकारी ने हामी भर दी। बावजूद इसके कुछ समय बीतने पर उसी मूर्ति की कीमत महाराज ने 11 लाख रुपये कर दी। बाद में मण्डलेश्वर ने कहाकि क्या मूर्ति आप 11 लाख रुपये दे दो मूर्ति तो लग ही जाएगी। अधिकारी मण्डलेश्वर की चाल समझ गए और उन्होंने महाशय को अपना पीछा ही छूड़ा लिया।
अपनी उगाही कला में महामण्डलेश्वर इतने प्रवीण है कि किसी के भी पक्ष विपक्ष में इनसे धरना-प्रदर्शन, बयानबाजी करवायी जा सकती है। बस हर काम का इनके यहां पैसा लगता है। हाल ही में इनका एक संत से विवाद चल रहा था। संत को महाशय ने काफी परेशान किया। मध्यस्तता के बाद जब संत ने इनके समक्ष 51 हजार का माथा टेका तो इनका व्यवहार संत के प्रति सगे भाई जैसा हो गया। महाशय ने 51 हजार मिलते ही इन्हें अलंकृत तक कर दिया। वैसे इन मण्डलेश्वर की अन्य कई खूबियां हैं। यहां तो संक्षेप में चर्चा की गयी है। ये हरफनमौला हैं। ऐसे में जब एक मण्डलेश्वर जैसे पद पर बैठकर ऐसे कृत्य करेगा तो सोचिए की इससे क्या सनातन की गरिमा बढ़ेगी।


