पैसा और चाटुकारिता को ही बनया धर्म
हरिद्वार। धर्म की नगरी कहे जाने वाले हरिद्वार में आजकल अधर्म का बोलबाला दिखायी दे रहा है। जिनके हाथों में धर्म की ध्वजा है वही उस ध्वजा को नीचा करने पर उतारू हैं। धर्म-कर्म छोड़कर बस माया के पीछे दौड़ लगा रहे हैं। जबकि ऐसे लोग आम जनमानस को मोह-माया से दूर रहने का उपदेश देते हैं।
बात तीर्थनगरी में कुछ अखाड़ों की कर रहे हैं। जहां एक के बाद एक जगद्गुरु, शकराचार्य, महामण्डलेश्वर बनाए जा रहे हैं।
वैसे महामण्डलेश्वर कोई पद संन्यास में नहीं है। बस यह केवल भेड़चाल है। पूर्व में मण्डलीश्वर शब्द हुआ करता था। यानि की जो संतों की मण्डली का नेतृत्व करता हो। वह विद्वान, तपस्वी और धर्म मर्यादा के अनुसार आचरण करने वाला होता था। गांव-गांव भ्रमण कर धर्म की शिक्षा दिया करता था। किन्तु आज स्थिति बिल्कुल उलट है। आज अनपढ़ भी पैसे के बल पर महामण्डलेश्वर बनाए जा रहे हैं।
मण्डलीश्वर से महामण्डलेश्वर की कैसे उत्पत्ति हुई इसके संबंध में अगले अंक में चर्चा करेंगे।
मजेदार बात यह कि होटलों में शराब और कबाब की पार्टी करने वाले को भी आज महामण्डलेश्वर बना दिया गया है। पूर्व में महामण्डलेश्वर की शराब और कबाब पार्टी की वीडियो वायरल हुई थी। आलम यह है कि संगीन आरोपों में घिरे व्यक्ति आचार्य बने हुए हैं। गैर ब्राह्मण को पैसे के बल पर आचार्य बनाया हुआ है।
समाज को ज्ञान बांटने वालों की स्थिति आज ऐसी है कि बस पैसा लाओ और पद ले जाओ। एक महामण्डलेश्वर बनने के लिए कम से कम 20 लाख रुपये चाहिए होते हैं। जबकि आचार्य बनने के लिए 5 करोड़ की आवश्यकता होती है। जो वादा करके रुपये नहीं दे पाता, कुछ समय बाद उस पर कोई भी आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। स्थिति यह कि विद्वानों के समक्ष यह सब हो रहा है और वे मौन धारण किए हुए हैं। गिरावट का आलम यह है कि यदि कोई ठीक ठाक रुपया इन लोगों को मुहैय्या करा दे तो यह आम आदमी को भगवान भी बना सकते हैं। जगद्गुरु तो ये बना ही चुके हैं।
वैसे जगद्गुरु से याद आया की जगद्गुरु कहते किसे हैं। जो सभी शास्त्रों और वेद-पुराणों में प्रवीण हो, देश में भ्रमण कर शास्त्रार्थ के माध्यम से विद्वानों को परास्त करे और समूचे विद्वानों में उसकी स्वीकृति हो, वहीं जगद्गुरु कहलाता था। किन्तु आज तो विद्वता गई भाड़ में, जो धन दे उसको कुछ भी उपाधि प्रदान करने वाले धर्म रक्षक यहां मौजूद हैं।
आमजन मानस को ज्ञान बांटने वाले, धर्म को गर्त में ले जाने की कोशिश करने वाले कथित भगवाधारी इस बात को जानते हैं कि कफन में जेब नहीं होती, लाश के पैरों में जूतियां नहीं होती और मौत के दफ्तर में कभी छुट्टियां नहीं होतीं, बावजूद इसके ये अपने को अमर माने बैठे हुए हैं और मृग तृष्णा की भांति धन के पीछे दौड़ लगा रहे हैं। न इनको देश से और न ही धर्म से कोई सरोकार है। बस पैसा और चाटुकारिता ही इनका धर्म बन गया है।


