राजनीतिक मध्यस्थता भी नहीं लाई रंग, पुराने मतभेदों के फिर उभरने की चर्चा
आने वाले दिनों में अखाड़ों की राजनीति में हो सकता है बड़ा बदलाव
हरिद्वार। अखाड़ों के बीच सुलह और आपसी सहमति की कोशिशों के बीच एक बार फिर मनमुटाव की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कभी एक-दूसरे के करीबी माने जाने वाले दो अखाड़ों के बीच इन दिनों दूरियां बढ़ने की चर्चाएं संत समाज में हलचल पैदा कर रही हैं। सूत्रों की मानें तो एक अखाड़े के कर्ताधर्ता की ओर से दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने के प्रयास किए गए, लेकिन शुरुआती कोशिशों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। ऐसे में निगाहें अब आगे बनने वाले नए समीकरणों पर टिकी हैं।
सूत्रों के अनुसार, एक अखाड़े के कर्ताधर्ता ने जिले के एक राजनेता को अपना दूत बनाकर सुलह के लिए दूसरे अखाड़े के श्रीमहंत तक भेजा था। इस पहल का उद्देश्य दोनों के बीच संवाद स्थापित कर पुराने मतभेदों को दूर करना था। हालांकि, यह कोशिश फिलहाल निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुंच सकी। दो टूक जबाव मिलने के बाद दूत को निराश होकर वापस लौटना पड़ा। इसके बाद सुलह की संभावनाएं काफी क्षीण हो चुकी हैं। इसके साथ ही केकई को भी निराश होना पड़ा।
पुराने संबंधों में खटास, बदल सकते हैं समीकरण
अखाड़ों के बीच चल रही इस खींचतान को केवल आपसी मनमुटाव तक सीमित नहीं माना जा रहा। सूत्रों का दावा है कि इसके पीछे लंबे समय से चल रही अंदरूनी राजनीति और प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों के साथ दूसरे पक्ष को कमजोर करना माना जा रहा है।
चर्चा है कि जिसके पास दूत भेजा गया उन श्रीमहंत की सहज और भावुक प्रवृत्ति का कुछ लोगों ने फायदा उठाया। सूत्रों की ओर से पिछले चार-पांच वर्षों में आर्थिक नुकसान पहुंचाए जाने की भी चर्चा है। जिसके चलते करीब तीन करोड़ के लगभग कर्ताधर्ता श्रीमहंत को चूना लगा चुका है।
फूटो डालो और राज करो की रणनीति पर चर्चा
अखाड़ों के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर एक कथित रणनीति की भी चर्चा है, जिसके तहत तस्वीरों और सार्वजनिक निकटता के जरिए प्रभाव बनाने की कोशिश की जाती रही। संत समाज के कुछ लोगों के बीच अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पुराने संबंधों और विश्वास के आधार पर बने समीकरण पहले जैसे बने रह पाएंगे। संत समाज में संतों की केकई नाम से विख्यात कर्ताधर्ता केचल और केवल अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता है।
संतों की इस केकई की खास बात यह है कि यह समय देखकर गिरगिट से भी तेज रंग बदलने की कला में माहिर है। यदि सामने वाला पक्ष कमजोर हो तो यह एक दम दबाने की कोशिश करता है और अपनी ऊंगली दबी होने पर यह पैर पकड़ने में न तो देर करता है और न संकोच। इसकी इस कला को अब पूरा संत समाज जान चुका है। ऐसे में इस कर्ताधर्ता की अब अलग ही ढपली बचने की सभावना प्रबल हो चुकी है।
आने वाले दिनों पर टिकी संत समाज की नजर
मौजूदा घटनाक्रम के बीच दोनों पक्षों के बीच सुलह की संभावनाएं पूरी तरह लगभग समाप्त नजर आ रही हुई हैं। किन्तु कहावत है कि एक साथ छूटता है तो दूसरा परमात्मा जोड़ देता है। ऐसा भी होने की संभावना नजर आ रही हैं।
मजेदार बात यह कि श्रीमहंत के सीधेपन का फायदा उठाकर आर्थिक और राजनैतिक लाभ उठाने वाला कर्ताधर्ता श्रीमहंत के अखाड़े का बर्बाद करने की पूर्व में सौंगध खा चुका था। जिसका श्रीमहंत को आभास तक नहीं था। खैर अब कुछ समझ में श्रीमहंत की आ चुका है। अब देखना होगा की संतों की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है।
फिलहाल संत समाज में चर्चाओं का बाजार गर्म है। ऐसे में संबंधित श्रीमहंतों के लिए जरूरी माना जा रहा है कि वे किसी भी निर्णय से पहले केकई के बहकावे न आएं और पड़ताल करें, आपसी संवाद को प्राथमिकता दें, ताकि अखाड़ों की परंपरा, आपसी सौहार्द और संत समाज की प्रतिष्ठा बनी रहे।

