ज्ञान से कैंसर को कैसे हराया जा सकता है

कैंसर जैसी भयानक शरीर की बीमारियों से कैसे उठें। रिलैक्स में कैसे आएँ। शरीर में बीमारियाँ तो बहुत आती हैं, पर ‘कैंसर’ शब्द सुनते ही हम दुखी हो जाते हैं। जब तक जीवन का ज्ञान, यानी आत्मा का ज्ञान, नहीं मिलेगा तब तक ‘कैंसर’ और अन्य परेशानियों से सम्बंधित डर नहीं जा सकता और उसके प्रति पूर्ण स्वीकारता भी नहीं आ सकती।

आत्मा क्या है? एक ऊर्जा, एक चेतना, जो इस शरीर को चला रही है। तो सवाल उठता है कि यह शरीर किसने और क्यों बनाया? कहा जाता है— भगवान ने। जिनको आज हम भगवान कहते हैं, वे भी कभी हमारी तरह ही इस संसार में आए थे, पर एक समय उन्होंने जाना कि जीवन क्या है, जन्म क्यों होता है, और यह सब खेल क्या है। उन्होंने हर परिस्थिति का कारण जान लिया, यानि इस सवाल का जवाब जान लिया की—मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ।

हमें यह समझना है कि जन्म का अर्थ है आत्मा (ऊर्जा) का शरीर में आना और उसी आत्मा का बाहर जाना मृत्यु कहलाता है। वास्तव में जन्म और मृत्यु किसी की नहीं होती—हम इस शरीर में केवल यात्री हैं। जिन्होंने यह जाना, उन्होंने खुशहाली पाई।

आज आपके मन में भी यह प्रश्न जरूर उठता होगा कि कैंसर जैसी बीमारी किसी के जीवन में या उनके संबंधों के जीवन में क्यों आती है ? इसका जवाब पाने के लिए हमें भाग्य बनने का कारण समझना होगा। हम सुनते आए हैं कि इस शरीर में हमारे लाखों-करोड़ों जन्म हो चुके हैं, यानी हम इस शरीर में कई करोड़ों वर्षों से आते रहे हैं। जाने-अनजाने ऐसे कर्म हो जाते हैं जिनके कारण हमें बार-बार इस शरीर में आना पड़ता है। इस संसार में जन्म ही दुख है। पाँच सौ वर्ष पहले गुरु नानकदेव जी ने कहा—‘दुखिया सकल संसार’, और पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने कहा—’संसार दुख है’। शरीर में हमारा—यानी हमारी आत्मा का- बार-बार आना एक खेल है— इसे समझना जरूरी है। इच्छा में आसक्ति आई तो जन्म हुआ। यह बात भगवद्गीता , गुरु ग्रंथ साहिब, उपनिषदों और सभी धर्मग्रंथों में लिखी है।

आज हम देखते हैं की किसी के शरीर में कोई बीमारी है, किसी के शरीर में कोई और। पर जिसने यह शरीर बनाया, वह अपने ही शरीर को बीमारी क्यों देगा—क्या कभी हमने यह सोचा? जिस परमात्मा ने इतना अमूल्य शरीर बनाया है कि इसके मरने के बाद सारी दुनिया की दौलत देकर भी इस शरीर में एक मिनट की जिंदगी नहीं मिल सकती, वो अपने ही बनाये शरीर को तकलीफ क्यों देता है? जब समझ आता है कि वह बनाने वाला हमारे ही पिछले जन्मों में किए कर्मों को जलाने के लिए अपने ही शरीर को कष्ट दे रहा है, तो उसके प्रति हमारे भीतर प्रेम भाव आ जाता है। तभी कहा गया है—अपने को सदा रिलैक्स में रखो, शिकायत मत करो। गीता में कहा गया है—‘जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा ही होगा’। गुरु नानकदेव जी ने भी कहा—‘हुकुम के अंदर सब, हुकुम के बाहर ना कोए, हुकुम रजाईं चलना’। यही यीशु कहते हैं—’सब स्वीकार करो’। यही महावीर कहते हैं—‘अहिंसा परमोधर्म’, यानी अपने प्रति हिंसा मत करो, अपने को दुखी मत करो। क्योंकि भीतर का दुख, परेशानी और अशांति फिर से कर्मों को जलने नहीं देती। जब हम रिलैक्स में आते हैं, तब उस रचयिता का नियम काम करता है—वह हमारे भाग्य को बदल देता है, और बीमारी अपने आप ठीक होने लगती है, क्योंकि हमने परमात्मा का नियम समझ लिया। डॉक्टर, नर्स और सभी सेवा कर रहे हैं, क्योंकि परमात्मा ने उन्हें शरीर की वर्कशॉप के लिए चुना है।

जीवन का यह ज्ञान पाने पर स्वयं खुशहाली और मौज का अनुभव होने लगता है। जब जीवन ऐसे आनंद में आ जायेगा तो बीमारियों में तेजी से सुधार होगा और हर हाल में जिंदगी खुशहाल बानी रहेगी।

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