हरिद्वार। वर्तमान में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का पूर्व में नाम अखिल भारतीय षड् दर्शन अखाडा परिषद होता था। जिसमंे शम्भू दल के आवाहन, अटल, महानिर्वाणी, आनन्द, निरंजनी, अग्नि, जूना और रामादल के निर्मोही अनी, निर्वाणी अग्नि, दिगम्बर अनि तथा दोनों उदासीन बडा व नया अखाडा तथा निर्मल अखाडा मिलकर षड् दर्शन अखाडा परिषद बनता था। षडदर्शन में सभी 126 मत, मतांतर, पंथ शामिल होते थे। किन्तु वर्तमान में सब अपनी ढपली अपना राग अलापने में लगे हुए हैं।
अब अर्द्ध कुंभ और अखाड़ा परिषद को लेकर संतों के बीच में वाक युद्ध चल रहा है। एक-दूसरे पर पलटवार का सिलसिला जारी है। इससे सनातन की कितनी क्षति हो रही है और संतों की गरिमा कैसे धूल धूसित हो रही है, इसका किसी को भी भान नहीं है।
एक समय था जब राज सत्ता धर्म सत्ता का अनुसरण करती थी। किन्तु वर्तमान में धर्म सत्ता राज सत्ता की मानो दासी बनकर रह गयी है। धर्म सत्ता का ऐसा हाल हो गया है कि राज सत्ता का जरा सा इशारा मिलते ही धर्म सत्ता से जुड़े लोग करबद्ध कतार में लगकर स्तुतिगान करने पर उतारू हो जाते हैं।
धर्म सत्ता में अपराधिक किस्म के लोगों का प्रवेश होने से परम्पराओं का और अधिक ह्ास हो गया है। अब आश्रम, अखाड़ों में धर्म-कर्म के कार्यों के स्थान पर व्यापार हावी होता दिखायी दे रहा है। जबकि अखाड़े सनातन संस्कृति के संवाहक माने जाते हैं। हालात यह हैं कि गृहस्थ से साधु बनने की परम्परा के बाद अब साधु गृहस्थ बनने लगे हैं। परिवार में रहकर भगवा धारण किए घूमते हैं, जबकि भगवा धारण करने का अर्थ है कि व्यक्ति ने जड़, चेतन सभी प्रकार के पदार्थों का त्याग कर दिया है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से विलग है।
बाबा बलराम दास हठयोगी ने संत का चोला पहनकर गृहस्थ लोगों के खिलाफ आवाज भी उठायी। उन्होंने कहाकि एक संत दर्शन भारती भगवा धारण किए हुए घूमते हैं, जबकि वह संत नहीं गृहस्थ हैं। उनके बीबी-बच्चे हैं। ऐसे में भगवा का अपमान किया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि इन्हीं दर्शन भारती को लेकर हाल ही एक वाक्या सामने आया, जिससे संतों की काफी फजीहत हुई। डोईवाला में एक कार्यक्रम के दौरान प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री की स्वामी दर्शन भारती संग भेंट हुई। वहां कई अन्य संत भी मौजूद थे। पूर्व मुख्यमंत्री ने पूछ ही लिया क्या ये भी संत बन गए हैं। यदि संत बन गए हैं तो इनके बीबी-बच्चों का क्या। उन्होंने कहाकि यदि संत का चोला पहनने के बाद बीबी-बच्चे रखे जा सकते हैं तो हम क्यों संत का चोला धारण नहीं कर सकते। वैसे बात हास-परिहास की थी, किन्तु वास्तव में भगवा का कितना अपमान हुआ इसको कहने की जरूरत नहीं है।
खैर बीबी-बच्चे वाले भगवाधारियों की संख्या काफी अधिक है। यहां तो नाबालिग बच्चियों को भगा ले जाने वाले भी संत का चोला धारण किए हुए हैं। अपहरण, बलात्कार के प्रयास, धोखाधड़ी के कई भगवाधारियों पर आरोप हैं। बावजूद इसके वह तपस्वी संतों की गिनती में आते हैं।
इन बातों को छोड़ दें तो सभी संत किसी के भी द्वारा की गयी बयानबाजी पर सनातन को कमजोर करने की बात कहने लगते हैं। जरा सोचिए जब तेरह अखाड़ों में एका नहीं है। अखाड़ा परिषद में वोट देने वाले 26 संतों मंे विघटन है, तो सनातन कैसे कमजोर नहीं होगा। दूसरों को उपदेश देने वाले खुद नियम, मर्यादा, परम्परा, शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं, तो सनातन कैसे मजबूत होगा।
देखा जाए तो वर्तमान में सनातन पर जो हमले हो रहे हैं, उसका असली कारण हमारे कथित धर्माचार्य ही हैं। सनातन की रक्षा केवल भाषणों तक सीमित है। यह तो सनातन की आड़ लेकर धन एकत्रित करने, ऐश का जीवन जीने और धर्मपरायण जनता का बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करने पर लगे हुए हैं। कुंभ और अर्द्धकुंभ को लेकर संतों के बीच उपजा विवाद और वाक युद्ध सनातन की रक्षा के लिए नहीं बल्कि स्ंवय को श्रेष्ठ साबित करने चापलूसी और अपनी राजनीति चमकाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।
यदि वास्तव में सनातन की रक्षा करनी है, तो परम्पराओं, शास्त्र मर्यादा और नियमों के मार्ग का अनुसरण करना होगा। सनातन की रक्षा करनी है, तो पहले स्वंय के जीवन में इनको अपनाना होगा। केवल बयानवीर बनकर सनातन की रक्षा नहीं की जा सकती। पहले सभी तेरह अखाड़ों में चले आ रहे विघटन को रोकना होगा और शास्त्र मर्यादा के अनुसार पर्वों का आयोजन करना होगा, तभी सनातन की रक्षा की जा सकती है। अन्यथा सनातन को गर्त में डूबने से कोई नहीं बचा सकता और जिस प्रकार से सनातन पर हमले बढ़ते जा रहे हैं, आपसी फूट के चलते इनमें और बढ़ोतरी होगी। जिसका खामियाजा आने वाली पीढि़यों को भुगतना होगा और उसकी जिम्मेदारी कथित धर्म के ठेकेदारों की होगी।


