उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे हो जाने पर रजत जयंती वर्ष में विधानसभा में विधायक विनोद चमोली ने जिस आचरण का प्रयोग करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि, भाजपा के पहाड़ के विधायकों की मानसिकता धर्मनगरी को उत्तराखंडी कतई नहीं मानने की हैं। विधायक किशोर उपाध्याय ने अनादि काल से बह रही पतित पावनी माँ गँगा का जल मैदानी क्षेत्र में जाने पर रोक लगाने की हास्यास्पद धमकी भी सदन में दे डाली। इससे ज्यादा पीड़ादायक बात तो यह रही कि भाजपा के हरिद्वार के तीनों विधायक मदन कौशिक, आदेश चौहान, और प्रदीप बत्रा मोनी बाबा बनकर बैठे रहे क्यों? इस प्रश्न के कई उत्तर है जिनका उल्लेख करना अभी ठीक नहीं। परंतु हरिद्वार (ज्वालापुर) के विधायक रवि बहादुर और लक्सर (हरिद्वार) के विधायक शहजाद ने जिस दबंगई से इस क्षेत्रवाद की मानसिकता का डटकर विरोध किया, वह काबिले तारीफ है।
ज्वालापुर (हरिद्वार) के विधायक रवि बहादुर ने प्रेस वार्ता कर स्पष्ट कह दिया है कि हरिद्वार की अस्मिता तथा सम्मान के लिए सभी गैर भाजपाई विधायकों, ग्राम प्रधानों, संगठन तथा आलाकमान से बात कर संघर्ष की शुरुआत की जाएगी।उत्तराखंड के गठन से ही तंज झेल रहे इस जनपद की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि जब उत्तराखंड राज्य का बिल लोकसभा में प्रस्तुत होना था तो 12 जिलों की ही सूची तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तैयार की थी, परंतु संघ के कुछ पदाधिकारी और उत्तराखंड के एक तत्कालीन मुख्यमंत्री की लाबी ने इन मुख्यमंत्री के चहेते एक भाजपा परिवार के घर में बैठ कर हरिद्वार की धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, रिक्शा, टैक्सी, धर्मशाला इत्यादि दर्जनों के अर्जी फर्जी लेटर हेडों पर हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल करने के फैक्स (उस समय फैक्स का ही जमाना था)।
तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भेजे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कई फोन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई गृहमंत्री श्री आडवाणी को करवाए की हरिद्वार की जनता उत्तराखंड में शामिल होना चाहती हैं। नतीजा रातों-रात 12 जिलों के बिल में हरिद्वार का नाम जबरन शामिल कर 13 जिलों का बिल लोकसभा में शामिल कर पास कर उत्तराखंड राज्य की घोषणा कर दी गई।
हरिद्वार की जनता से छल करने के विरोध में ललताराव पुल पर स्वर्गीय अमरीश कुमार और भारतीय किसान यूनियन के तत्कालीन अध्यक्ष स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत ने धरना प्रदर्शन, भूख हड़ताल और जुलूस निकाले परंतु सत्ता की ताकत से उनकी आवाज को बलपूर्वक कुचल कर हरिद्वार के जनमत संग्रह के बिना हरिद्वार को शामिल किया गया।नतीजा आज 25 वर्षों से उत्तराखंडी हरिद्वार को उत्तराखंडी ना मानकर दोयम दर्जे का नागरिक मानते आ रहे हैं।
स्वयं को उत्तराखंड का हमदर्द मानने वाले जो विधायक स्वयं मैदानी क्षेत्रों में आलीशान बंगलो में निवास करते हैं वह पलायन रोकने की बातें करते हैं, यदि पलायन रोकने की दिल से इच्छा है तो वह पहाड़ों पर जाकर क्यों नहीं निवास करते? क्यों नहीं 25 सालों में भी मूलभूत सुविधाएं पहाड़ी क्षेत्रों मैं ले जाने पर कोई ठोस रणनीति बनाते। एक पलायन आयोग बना था आज कई सालों से ना आयोग का कुछ पता है ना इस आयोग की किसी रिपोर्ट का।
मूल निवास की बात करने वाले बताएं कि 25 वर्षों में हरिद्वार जनपद वासियों को मूल निवास प्रमाण पत्र क्यों नहीं? केंद्र सरकार ने पाकिस्तान का पानी रोकने की बात कही अब राज्य सरकार के नए-नए सुरमा हरिद्वार का पानी रोकने की धमकी देकर अपनी गंदी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। हरिद्वार में पतित पावनी माँ गँगा के पानी को टिहरी बाँध से बंद करने की धमकी शत्रुवत नफरती सोच को जाहिर करती, इस गंभीर विषय पर माननीय मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष की चुप्पी भी हैरान करने वाली हैं।
उत्तराखंड के लोग परिश्रमी, शांत, सरल, ईमानदार और सादगी पसंद हैं। परंतु कुछ चालाक सियासती आगामी विधानसभा चुनावों में पहाड़ बनाम मैदान को मुद्दा बनाकर आग लगाकर अपनी रोटियां सेकने, और प्रदेश को उस आग से झुलसाना चाहते हैं। क्षेत्रवाद की मानसिकता तक सीमित लोगों के कारण आज कई नेता, ठेकेदार, अफसर शाह विकास के नाम पर प्रतिशत व दूसरे खेलों में अरबपति बन गए हैं और पहाड़ का गरीब सीधा-साधा युवा ऐसे नेताओं की मेहरबानी से बेरोजगार सड़कों पर धक्के खा रहा हैं। यही हाल रहा तो अगले कुछ वर्षों में प्रदेश की क्या स्थिति होगी यह लिखने की आवश्यकता नहीं हैं।
डॉ रमेश खन्ना
वरिष्ठ पत्रकार
हरिद्वार (उत्तराखंड)


