निरंजन पीठाधीश्वर को नहीं है दशनामी परम्पराओं का ज्ञानः मदनमोहन गिरि

परम्पराओं को जानने के लिए शंकर भाष्य, श्ंाकर दिग्विजय व मठाम्नायन ग्रंथों का अध्ययन करें

हरिद्वार। तपोनिधि श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी के वरिष्ठ संत स्वामी मदनमोहन गिरि महाराज ने कहाकि निरंजन पीठाधीश्वर को दशनाम परम्पराओं का ज्ञान नहीं है। इस कारण वे परम्पराओं के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्हें शंकर भाष्य, श्ंाकर दिग्विजय व मठाम्नायन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और दशनाम की परम्पराओं का ज्ञान लेना चाहिए। इसके बाद कुछ बयान करें तो उचित रहेगा। उन्होंने कहाकि निरंजनी अखाड़े का आचार्य होने के बाद भी इन्हें आनन्दवार और भूरवार का ज्ञान नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता तो वे बलवीर पुरी को बाघम्बरी का उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा नहीं करते। उन्होंने कहाकि बलवीर पुरी भूरवार संत हैं। जबकि बाघम्बरी गद्दी आनन्दवारों की है। ऐसे में आचार्य ने गलत घोषणा कर अपने ज्ञान को प्रस्तुत किया है। उन्हांेंने कहाकि भूरवार को आनन्दवार बनाने की क्या परम्परा है। इसका भी उन्हें खुलासा करना चाहिए। कैसे भूरवार को इन्होंने आनन्दवार बना दिया। उन्होंने मीडिया और संतों पर भी सवाल उठाते हुए कहाकि जिस बलवीर पुरी को बलवीर गिरि कहकर प्रस्तुत किया जा रहा है, वह बलवीर गिरि कैसे हो गया। जबरन कुछ संत और मीडिया बलवीर पुरी को बलवीर गिरि के रूप में प्रस्तुत करने का कार्य कर रहे हैं। जो की सरासर गलत है। स्वामी मदनमोहन गिरि महाराज ने कहाकि बलवीर पुरी को बलवीर गिरि बताकर उत्तराधिकारी बनाने के पीछे भी बड़ा षडयंत्र है। पहले नरेन्द्र गिरि बाघम्बरी की करोड़ों की जमीन को बेच गए, अब फिर कुछ संत बाघम्बरी की जमीन पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं। जिस कारण से परम्पराओं को ताक पर रखकर गलत घाषणाएं कर रहे हैं। उन्होंने कहाकि अखाड़े के कुछ संत भूमाफिया का कार्य कर रहे हैं। यही कारण है कि पुरी को जबरन गिरि बनाया जा रहा है। उन्होंने कहाकि वसीयत बलवीर गिरि के नाम पर हुई है। ऐसे में बलवीर पुरी को कैसे गद्दी की कमान सौंपी जा सकती है। उन्होंने कहाकि इसी के चलते अग्नि अखाड़े के आचार्य मण्डलेश्वर स्वामी रसानंद महाराज की करोड़ों की जमीन को जबरन बेच दिया गया। उन्होंने कहाकि वर्षाें से चली आ रही परम्पराओं में गलत नहीं होने दिया जाएगा। संत को अपने वेश के अनुुसार आचरण करना चाहिए। सत्य के मार्ग पर चलना और दूसरों की सम्पत्ति पर जबरन कब्जा करना संतों का कार्य नहीं है और न ही संत बनने के बाद ऐसे कृत्य शोभा देते हैं।

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