घी के साथ गिलोया का सेवन करने से वात रोग नष्ट होता है।
गुड़ के साथ गिलोय का सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
खाण्ड के साथ गिलोया का सेवन करने से पित्त दूर होती है।
शहद के साथ गिलोय का सेवन करने से कफ की शिकायत दूर होती है।
रेण्डी के तेल के साथ गिलोय का उपयोग करने से गैस दूर होती है।
सोंठ के साथ गिलोय का उपयोग करने से गठिया रोग ठीक होता है।
आयुर्वेद के अनुसार गिलोय बुखार को दूर करने की सबसे अच्छी औषधि मानी जाती है। यह सभी प्रकार के बुखार जैसे टायफाइड (मियादी बुखार), मलेरिया, मंद ज्वर तथा जीर्ण ज्वर (पुराने बुखार) आदि के लिए बहुत ही उत्तम औषधि है। इससे गर्मी शांत करने की शक्ति होती है।
गिलोय गुण में हल्की, चिकनी, प्रकृति में गर्म, पकने पर मीठी, स्वाद में तीखी, कड़वी, खाने में स्वादिष्ट, भारी, शक्ति तथा भूख को बढ़ाने वाली, वात-पित्त और कफ को नष्ट करने वाली, खून को साफ करने वाली, धातु को बढ़ाने वाली, प्यास, जलन, ज्वर, वमन, पेचिश, खांसी, बवासीर, गठिया, पथरी, प्रमेह, नेत्र, केश और चर्म रोग, अम्लपित्त, पेट के रोग, मूत्रावरोध (पेशाब का रुकना), मधुमेह, कृमि और क्षय (टी.बी.) रोग आदि को ठीक करने में लाभकारी है।
यूनानी पद्धति के अनुसार गिलोय की प्रकृति गर्म और खुश्क होती है। यह तीखा होने के कारण से पेट के कीड़ों को मारता है। यह सभी प्रकार के बुखार में बहुत ही लाभदायक है।
वैज्ञानिको के अनुसार
गिलोय की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर यह पता चला है कि इसमें गिलोइन नामक कड़वा ग्लूकोसाइड, वसा अल्कोहल ग्लिस्टेराल, बर्बेरिन एल्केलाइड, अनेक प्रकार की वसा अम्ल एवं उड़नशील तेल पाये जाते हैं। पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फास्फोरस और तने में स्टार्च भी मिलता है। कई प्रकार के परीक्षणों से ज्ञात हुआ की वायरस पर गिलोय का प्राणघातक असर होता है। इसमें सोडियम सेलिसिलेट होने के कारण से अधिक मात्रा में दर्द निवारक गुण पाये जाते हैं। यह क्षय रोग के जीवाणुओं की वृद्धि को रोकती है। यह इन्सुलिन की उत्पत्ति को बढ़ाकर ग्लूकोज का पाचन करना तथा रोग के संक्रमणों को रोकने का कार्य करती है।
Dr. (Vaidhya) Deepak Kumar
Adarsh Ayurvedic Pharmacy
Kankhal Hardwar
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